हिमालयी क्षेत्रों में प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और सुशासन पर हुआ गंभीर मंथन

देहरादून : दून विश्वविद्यालय के सभागार में आयोजित “हिमालयी एक्शन स्कूल” कार्यक्रम के दूसरे दिन प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण, सुशासन, रोजगार, पलायन और महिलाओं की स्थिति जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर व्यापक विमर्श हुआ। देश-विदेश से आए विशेषज्ञों, शोधकर्ताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने हिमालयी क्षेत्रों के समक्ष बढ़ती चुनौतियों तथा उनके समाधान पर अपने विचार साझा किए।

नागालैंड से आए डॉ. अंबा जमीर ने कहा कि पहले उनके राज्य में प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग और विकास संबंधी निर्णय समुदाय आधारित व्यवस्था के तहत लिए जाते थे, लेकिन वर्तमान में यह व्यवस्था कमजोर पड़ती जा रही है, जिससे स्थानीय लोगों के पारंपरिक अधिकार प्रभावित हो रहे हैं।

नेपाल की पूर्व विदेश मंत्री डॉ. विमला राय पौड़ियाल ने कहा कि नेपाल में प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए परंपरागत नियम आज भी लागू हैं, लेकिन बदलती राजनीतिक व्यवस्थाओं के कारण इनमें परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं, जो नए खतरे पैदा कर रहे हैं।आईएमआई से सेवानिवृत्त डॉ. रमेश नेगी ने कहा कि आजादी के बाद की विकास नीतियों और वर्तमान व्यवस्था में बड़ा बदलाव आया है। उन्होंने बढ़ते निजीकरण पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि प्राकृतिक संसाधनों को अब सार्वजनिक हित के बजाय निजी स्वार्थ के नजरिये से देखा जाने लगा है। उन्होंने स्वच्छता क्षेत्र में उपलब्ध संसाधनों के समुचित उपयोग की आवश्यकता भी बताई।

प्राकृतिक संसाधनों के विशेषज्ञ डॉ. जीत सिंह सनवाल ने उत्तराखंड की वन पंचायतों के अधिकारों में लगातार हो रही कमी पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि इससे प्राकृतिक संसाधनों के दोहन को बढ़ावा मिल रहा है।वरिष्ठ पत्रकार प्रेम बहुखंडी ने कहा कि उत्तराखंड की वन पंचायतों को सत्ता प्रतिष्ठानों ने अपनी बपौती समझ लिया है। उन्होंने जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों का उल्लेख करते हुए कहा कि उत्तराखंड समेत अधिकांश हिमालयी राज्य इसके दुष्प्रभाव झेल रहे हैं। उन्होंने प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए स्थानीय परंपराओं और सामुदायिक व्यवस्थाओं को मजबूत बनाने की जरूरत बताई।कार्यक्रम में श्रमयोग के अध्यक्ष डॉ. अजय जोशी, सामाजिक कार्यकर्ता विद्याभूषण रावत, कुलदीप वर्मा, मोहम्मद मीर हमजा, रेनू ठाकुर, तरुण जोशी, सोनी शबनम, डॉ. शिवानी पांडे और डॉ. सालमन खुर्शीद सहित विभिन्न हिमालयी राज्यों से आए प्रतिनिधियों ने जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न चुनौतियों और उनके सामाजिक प्रभावों पर अपने विचार रखे। वक्ताओं ने कहा कि प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ते संकट का सबसे अधिक असर हिमालयी क्षेत्रों की महिलाओं पर पड़ रहा है, क्योंकि उनका जीवन और आजीविका इन संसाधनों पर निर्भर है।

महिला प्रतिनिधियों ने इस बात पर भी चिंता जताई कि खेती-किसानी का अधिकांश कार्य महिलाओं द्वारा किए जाने के बावजूद उन्हें आज भी किसान का दर्जा नहीं मिल पाया है। उन्होंने महिला केंद्रित विकास योजनाओं की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि इसके बिना प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण संभव नहीं होगा।कार्यक्रम में उपस्थित विशेषज्ञों ने हिमालयी क्षेत्रों में प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण, स्थानीय समुदायों की भागीदारी, पारंपरिक ज्ञान और व्यवस्थाओं को सशक्त बनाने तथा सतत विकास की दिशा में ठोस कदम उठाने की आवश्यकता पर जोर दिया।

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TARUN DHIMAN

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