एनएचएआई के अनुसार, मौजूदा दो-लेन मार्ग पर प्रतिदिन करीब 18,456 वाहनों का आवागमन होता है। बढ़ते यातायात दबाव, जाम और सड़क दुर्घटनाओं की आशंका को देखते हुए इस मार्ग का चौड़ीकरण आवश्यक माना गया है। नई परियोजना से सड़क सुरक्षा में सुधार होगा और यात्रा अधिक सुगम बनेगी।
पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता देते हुए परियोजना के लिए निर्धारित 60 मीटर राइट ऑफ वे (आरओडब्ल्यू) को घटाकर केवल 23 मीटर रखा गया है, जिससे पेड़ों की कटाई न्यूनतम हो सके। फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट (एफआरआई) के वैज्ञानिक आकलन के आधार पर 754 पेड़ों को प्रतिरोपण (ट्रांसप्लांटेशन) के लिए चिन्हित किया गया है, जिन्हें आगामी मानसून में स्थानांतरित किया जाएगा।
वन्यजीव संरक्षण के लिए परियोजना में एक प्रमुख ब्रिज-कम-एलीफेंट अंडरपास, चार समर्पित एलीफेंट अंडरपास, ग्रीन गाइड हेज, साउंड बैरियर, एंटी-ग्लेयर स्क्रीन, वन्यजीव चेतावनी संकेतक, स्पीड कैल्मिंग उपाय और ‘नो हॉर्न’ जोन जैसी विशेष व्यवस्थाएं की गई हैं। हाथियों की सुरक्षित आवाजाही के लिए लगभग 3.5 किलोमीटर लंबी एलिवेटेड संरचना भी विकसित की जा रही है।
एनएचएआई ने बताया कि परियोजना सभी आवश्यक वैधानिक और पर्यावरणीय अनुमतियां प्राप्त करने के बाद शुरू की गई है। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की स्पष्टता के बाद राज्य सरकार ने निर्धारित शर्तों के तहत पेड़ों की कटाई और प्रतिरोपण की अनुमति प्रदान की है। परियोजना का कार्य सभी कानूनी एवं पर्यावरणीय मानकों का पालन करते हुए किया जा रहा है।
परियोजना पूरी होने के बाद देहरादून, जॉलीग्रांट एयरपोर्ट और ऋषिकेश के बीच यात्रा अधिक तेज, सुरक्षित और सुविधाजनक होगी। साथ ही चारधाम यात्रियों, पर्यटकों और स्थानीय लोगों को बेहतर सड़क सुविधाएं मिलेंगी, यातायात जाम में कमी आएगी तथा आधुनिक आधारभूत ढांचे के साथ पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में यह परियोजना एक महत्वपूर्ण उदाहरण बनेगी।
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